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Karn Ki Atmkatha By Manu Sharma / कर्ण की आत्मकथा फ्री डाउनलोड

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Karn Ki Atmkatha By Manu Sharma

 

 

 

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Karn Ki Atmkatha

 

 

 

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महारथी कर्ण को इतना अपमान सहना पड़ा था क्यों ?

 

 

 

त्रेता युग में दंबूरदाव नाम का एक राक्षस था। उसने सूर्यदेव की उपासना किया था। जब सूर्यदेव प्रसन्न हुए तब दंबूरदाव ने सूर्यदेव से अमर होने का वरदान देने के लिए कहा।

 

 

 

 

सूर्यदेव को पता था कि यह अमर होने का वरदान प्राप्त करते ही उत्पात मचाएगा। उन्होंने दंबूरदाव को अमरता का वरदान नहीं दिया।

 

 

 

 

तब दंबूरदाव राक्षस ने सूर्यदेव से अपने लिए सुरक्षा कवच माँगा और साथ में यह भी मांग लिया कि जो कोई भी उसके कवच को तोड़ेगा उसकी मृत्यु होनी चाहिए और उसके कवच को वही तोड़ेगा जो एक हजार वर्ष तक तपस्या किया हो।

 

 

 

 

 

तब सूर्यदेव ने नहीं चाहते हुए उसे एक हजार सुरक्षा कवच का वरदान दे दिया था। तब दंबूरदाव नामक राक्षस ने तीनो लोको में उत्पात आरम्भ कर दिया था।

 

 

 

 

सभी देवता तब भगवान हरि नारायण के पास गए। तब नारायण ने सभी को आश्वस्त करते हुए कहा, “कि अब दंबूरदाव का अंत निकट आ गया है।”

 

 

 

 

तब दक्ष प्रजापति की कन्या जिसका नाम मूर्ति था। उन्होंने ब्रह्मा के मानस पुत्र धर्म से अपनी मूर्ति नामक पुत्री का विवाह कर दिया।

 

 

 

 

मूर्ति से नर और नारायण नामक दो जुड़वा पुत्रो का जन्म हुआ। नर और नारायण दोनों की आत्मा एक ही थी। नारायण तपस्या करने चले गए और नर उसी समय सहस्त्र कवच नाम के राक्षस को युद्ध के लिए ललकारने लगे।

 

 

 

 

(दंबूरदाव के पास सहस्त्र कवच की सुरक्षा होने से ही उसका नाम सहस्त्र कवच पड़ गया था) तब सहस्त्र कवच ने नर से युद्ध शुरू कर दिया।

 

 

 

 

उधर नारायण तपस्या रत थे। उनके तप के प्रभाव से नर की शक्ति बढ़ती जा रही थी। उधर नारायण की तपस्या को एक हजार वर्ष पूर्ण हुआ।

 

 

 

 

तब नर ने दंबूरदाव के एक कवच को तोड़ दिया और सहस्त्र कवच का एक कवच टूटते ही नर की मृत्यु हो गई। तब नारायण दौड़ते हुए अपने भ्राता नर के पास आए।

 

 

 

 

उन्हें देखकर सहस्त्र कवच आश्चर्य में पड़ गया क्योंकि दोनों की आकृति समरूप थी। तब सहस्त्र कवच ने नारायण से कहा, “क्यों व्यर्थ ही अपने भ्राता के प्राणो की आहुति देते हो, तुम लोग हमसे कदापि नहीं जीत सकते हो ?”

 

 

 

 

 

तब नारायण ने अपने भ्राता को जीवन प्रदान करके तपस्या करने भेज दिया और स्वतः दंबूरदाव के साथ युद्ध करने के लिए उपस्थित हो गए।

 

 

 

 

इस तरह जब भी एक कवच टूटता था तब एक भ्राता की मृत्यु हो जाती थी। तब दूसरा भ्राता महा मृत्युंजय मंत्र के द्वारा अपने भ्राता को जीवन दान देकर उसे तपस्या करने भेज देता था।

 

 

 

 

 

इस तरह सहस्त्र कवच के निन्यानवे कवच भंग हो गए थे। एक कवच के बचने पर दंबूरदाव को अपनी मृत्यु सन्निकट लगने लगी। तब वह अपने प्राणो की रक्षा हेतु सूर्यदेव की शरण में जा पहुंचा।

 

 

 

 

तब नर और नारायण भी सहस्त्र कवच का पीछा करते हुए सूर्यदेव के पास गए और उसे दंड देने के लिए सूर्यदेव से मांगने लगे। तब सूर्यदेव ने दंबूरदाव को नर नारायण के हाथ में देने से मना कर दिया।

 

 

 

 

सूर्यदेव ने नर नारायण से कहा, “मैं इसकी ‘दंबूरदाव’ की रक्षा अवश्य ही करूँगा क्योंकि यह हमारी शरण में आया हुआ है।”

 

 

 

 

तब नर नारायण ने सूर्यदेव को शाप दे दिया कि इस दुष्टात्मा की रक्षा करने के लिए तुम्हे भी दंड भोगना पड़ेगा। इस तरह अपने दंड का प्रायश्चित करने के लिए ही सहस्त्र कवच का जन्म हुआ जिसके साथ ही सूर्य का अंश भी था।

 

 

 

 

 

जब कुंती ने अपने वरदान के सत्यापन करने के लिए सूर्यदेव का आवाहन किया था। तब सूर्यदेव के अंश के साथ ही सहस्त्र कवच का जन्म कर्ण के रूप में हुआ था।

 

 

 

 

जिसे सूर्य कवच जन्म से ही उपलब्ध था। उधर नर और नारायण के रूप में अर्जुन और कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ था। देवराज इंद्र को कवच का रहस्य ज्ञात था।

 

 

 

 

इसलिए उन्होंने दानवीर कर्ण से उसका अभेद्य कवच और कुंडल एक ब्राह्मण का रूप धारण करके मांग लाए थे। इस तरह अपने पूर्व के पाप के कारण ही महान योद्धा दानवीर कर्ण को इतना अपमान सहन करना पड़ा और अपना अभेद्य कवच भी दान में देना पड़ा था।

 

 

 

 

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