Shri Krishna Katha in Hindi Download / कृष्ण कथा फ्री डाउनलोड

Shri Krishna Katha in Hindi Download मित्रों इस पोस्ट में भगवान श्रीकृष्ण जी की कथा दी गई है।  आप इसे नीचे की लिंक से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

 

 

कृष्ण कथा पीडीऍफ़ फ्री डाउनलोड Shri Krishna Katha in Hindi Download Free

 

 

 

 

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भगवान श्रीकृष्ण ने तोडा सबका घमंड 

 

 

 

महाभारत का संग्राम खत्म हो चुका था। 18 दिन में बहुत से मनुष्यो की हानि हो चुकी थी। यादवो को अपने बल पर गर्व हो गया था और भगवान गर्व को ही अपना ग्रास बनाते है।

 

 

 

सभी यादव कहते थे हमारे ही कारण महाभारत के रण में पांडवो की बिजय संभव हुई। भगवान की लीला तो अपरंपार है। उन्होंने यादवो के गर्व को तोड़ने का निश्चय किया।

 

 

 

Shri Krishna Katha in Hindi Download
                                    Shri Krishna Katha in Hindi Download

 

 

एक बार एक क्रोधी मुनि द्वारका धीश का पता पूछते हुए उनसे मिलने द्वारका पहुंचे। द्वारका के बाहर यादवो के बालक खेल रहे थे।

 

 

 

 

 

 

उन्होंने मूसल को साड़ी पहनाकर एक औरत का रूप प्रदान किया हुआ था। बालको ने पूछा, “मुनिवर आप यह बताइए इस सुहागिन की गोद कब भरेगी ?”

 

 

 

 

 

 

मुनि ने ध्यान से देखा तो उन्हें ज्ञात हुआ कि यह यादव के लड़के उनका उपहास कर रहे है। मुनि ने कहा, “बालको इस सुहागिन की कोख से पैदा होने वाले के हाथो ही यादव कुल का नाश होगा।”

 

 

 

 

 

 

इतना कहकर मुनिवर द्वारका धीश श्री कृष्ण से मिलने पहुँच गए और उन्होंने द्वारका धीश को सारी बातें बता दिया। श्री कृष्ण जी बोले, “मुनिवर आपकी वाणी वृथा नहीं जाएगी। जो होगा वह अच्छा ही होगा।”

 

 

 

 

 

 

इधर यादवो के लड़को ने सोचा क्यों न हम लोग इस मूसल को ही नष्ट कर दे। उन्होंने मूसल को तोड़ फेक दिया। मूसल में लोहे का भाग था। वह एक बहेलिए के हाथ लग गया।

 

 

 

 

 

 

बहेलिए ने उस लोहे के भाग से तीर का निर्माण करवाया और आखेट के काम में उस तीर का उपयोग करने लगा। मूसल का जो लकड़ी का भाग था उससे एक प्रकार की बड़ी घास उग गई थी।

 

 

 

 

 

 

बलराम जी को जब मुनिवर का श्राप ज्ञात हो गया यब उन्होंने सोचा अब हमारी इस धरा पर कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने तप बल के सहारे अपने प्राणो का उत्षर्ग कर दिया।

 

 

 

 

 

 

यह खबर जानकर श्री कृष्ण चिंतन की मुद्रा में कालिंदी के तट पर लेट गए। इधर दैवीय प्रेरणा से सभी यादव वंश के लोग आपस में ही भिड़ गए।

 

 

 

 

 

 

उन्होंने मूसल की लकड़ी से उपजी घास को ही अस्त्र बना लिया और आपस में ही लड़ मरे। एक बहेलिया अपने आखेट के लिए आया हुआ था।

 

 

 

 

 

 

उसने एक हिरण का पीछा किया। हिरण श्री कृष्ण के पीछे जाकर छुप गया। बहेलिए ने हिरण को श्री कृष्ण की तरफ जाते हुए देखा था।

 

 

 

 

 

 

शयन मुद्रा में श्री कृष्ण के एक पैर का तलुवा सफेद रूप से चमक रहा था। बहेलिए ने सोचा यह हिरण की आँख चमक रही है और अपना तीर चला दिया।

 

 

 

 

 

 

तीर श्री कृष्ण के पैर के तलुवे में लगा तो भगवान मानव रूप में कराह उठे। तभी बहेलिया दौड़कर आया और अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करने लगा।

 

 

 

 

 

 

श्री कृष्ण जी बोले, “इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। मैंने रामावतार में छुपकर मारा था उस समय तुम वानर राज बालि थे। यह उसी का प्रतिशोध था जो आज पूर्ण हो गया।

 

 

 

 

 

 

इतना कहकर श्री कृष्ण मौन हो गए। देवताओ का समूह आकर उनसे गोलोक चलने का आग्रह करने लगे। तब श्री कृष्ण जी ने गोलोक प्रस्थान किया।

 

 

 

 

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